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बुधवार, 23 मई 2018

प्रेरणादायक कहानी- पूरा गाँव पानी के अभाव में मर रहा था, फिर एक 70 साल के बुजुर्ग ने अकेले दम पर खोद डाला कुआ

“हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा” यानी जो शख्स हिम्मत करके किसी काम को करता है तो ऊपर वाला भीउसकी हर मदद करता है। यह पंक्ति हम बचपन से सुनते आये हैं और कई बार कुछ लोगों के साथ इस बात को सार्थक होते भी देखा है। दशरथ मांझी इस बात का एक सशक्त उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने हौसले और हिम्मत के बल पर 22 साल कठिन मेहनत कर,अपना पूरा जीवन खपाकर पहाड़ को काटकर रास्ता बनादिया।सच ही कहा गया है मन के हारे हार है मन के जीते जीत, अगर व्यक्ति में कुछ कर गुजरने का हौसला होतो नामुमकिन का न हटाकर देखो तो वो भी मुमकिन होजाता है। कुछ ऐसे ही हौसले, हिम्मत और जुनून की दास्तां हैसीताराम लोधीकी कहानी।



मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित हैजिला छतरपुर जो कि एक सुखाग्रस्त जिला माना जाता है। वहां की स्थिति इतनी विकट है कि पानी के अभाव में लोग गाँव से पलायन करने को विवश हैं। ऐसे में छतरपुर जिले के प्रतापपुर ग्राम पंचायत के छोटे से गाँव हदुआ के रहने वाले 70 वर्षीय सीताराम लोधी ने अपने गाँव वालों को प्यास से त्रस्त देख एक संकल्प लिया कि वे अपने दम पर कुआं खोदेंगे। सीताराम के पास न तो कोई आर्थिक सहायता थी और न ही साथ देने के लिए लोग। फिर भी बस अपने श्रमबल की बदौलत वे निकल पड़े अपनी योजना को पूरा करने के लिए।



सीताराम ने अकेले ही साल 2015 में कुआँ खोदने का काम शुरूकिया और साल 2017 में 33 फीट तक गहरे कुआँ खोदने का काम पूरा भी कर डाला।निःस्वार्थ भाव से लोकहित के लिए काम करने वालेसीताराम की कहानी बड़ी ही रोचक है। उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का फैसला लिया और आज तक उस फैसले पर कायम हैं। सीताराम हदुआ गाँव में ही अपने छोटे भाई 60 वर्षीय हलके लोधी के साथ संयुक्त परिवार में रहते हैं। उनके पास अपनी आजीविका चलाने के लिए 20 एकड़ खेती की जमीन है।आखिर सीताराम के मन में कुँआ खोदने का विचार आया कहाँ सेइस बारे में बात करते हुए सीताराम बताते हैं कि “हमारे यहाँ सूखे के मौसम में पीने के लिए पानी का कोई साधन नहीं था और न ही हमारे पास इतने पैसे थे की कुएं या नल का इंतजाम कर सकें।



इसलिएमैंने अकेले ही कुआं खोदने का फैसला किया।”कुआं खोदना कोई आसान काम नहीं है इस बात को उनकापरिवार अच्छे से समझता था। इसलिए परिवार वालों ने उन्हें इस काम को करने से मना भी किया। लेकिनसीताराम कुआं खोदने की प्रतिज्ञा कर चुके थे औरउन्होंने किसी की बात नहीं मानी।
उनके भाई की मानें तो “हम कुआं खोदने के खिलाफ नहीं थे लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि कुआं खोदने पर पानी मिलेगा भी या नहीं। एक वक्त हम सबने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे नहीं माने।”उसके बाद क्या था सीताराम ने अपनी खेत की जमीन पर कुआं खोदने का काम शुरू कर दिया। वे रोज तड़केसुबह कुआं खोदना को निकल जाते और अपनी प्रतिज्ञा को सफल करने में जी जान से लगे रहते। बस वे दोपहर की धूप में कुछ देर काम बंद कर आरामकरते थे। इसके बाद धूप कम होते ही वे फिर से कामपर लगते और सूरज ढलने तक लगातार फावड़ा और कुदाल चलाते रहते। यही सिलसिला 18 महीनों तक नियमित तौर पर चलता रहा। फिर एक दिन सीताराम की मेहनत रंग लाई और किस्मत ने उनका साथ दिया। उन्हें 33 फीट की गहराई पर पानी मिल ही गया।
परिवार में सभी बहुत ही खुश थे लेकिन यह खुशी कुछ ही दिनों में काफ़ूर हो गयी। सीताराम ने कुआं तो खोद दिया था, पर किसी प्रकार की आर्थिक मदद न मिल पाने के कारण उसे पक्का नहीं करा पायेथे। मॉनसून में अधिक जल भराव के कारण उनके खून पसीने से सिंचित कुआँ ढह गया। दुःख की बात यह हैकि ऐसे में उन्हें कोई सरकारी सहायता भी प्राप्त नहीं हुई।सीताराम कुछ निराश होकर बताते है कि “अगर उन्हें सरकार की तरफ से मदद मिलती तो वे कुएंको पक्का करवा देते और उनकी मेहनत साकार हो जाती।”वैसे तो मध्य प्रदेश की सरकार किसानों को कुआं खोदने के लिए कपिल धारा योजना के तहत 1.8 लाख रुपये की आर्थिक मदद देती है। पर इसके लिए बाकायदा सरकार को आवेदन देना पड़ता है।इतना सब होने के बाद भी सीताराम के हौसले बुलन्द हैं। वे कहते हैं कि “मैं अभी भी पूरी तरह फिट हूँ और सरकार अगर थोड़ी सी मदद कर दे तो फिर से कुआं खोदने की हिम्मत रखता हूँ।”वाक़ई 70 साल की उम्र में एक नौजवान जैसे हौसले और जुनून रखने वाले सीताराम लोधी ने साबित कर दिया की उम्र तो महज़ एक नंबर है। अगर हौसला हो बुलंद तो पत्थर भी पानी बन सकता है।


सौजन्य- Humari, kenifolis

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