ज्योति प्रकाश की रिपोर्ट-
नई दिल्लीः दुनिया में बहुत सारे देशों में देह व्यापार को कानूनी मान्यता मिली हुई है, वहीं कुछ इसे गैर-कानूनी मानते हैं। भारत में भी वेश्यावृति को अवैध माना जाता है लेकिन इसके बावजूद यहां यह काम जोरों-शोरों पर है।
नई दिल्लीः दुनिया में बहुत सारे देशों में देह व्यापार को कानूनी मान्यता मिली हुई है, वहीं कुछ इसे गैर-कानूनी मानते हैं। भारत में भी वेश्यावृति को अवैध माना जाता है लेकिन इसके बावजूद यहां यह काम जोरों-शोरों पर है।
डेली मेल के अनुसार, क्या आपको यह बात पता है कि एशिया का सबसे बड़ा रेडलाइट एरिया भी भारत में ही है। वह जगह है पश्चिम बंगाल के कोलकाता की सोनागाछी। यह जगह जितनी बड़ी है, वहीं रहने वाली औरतों का गम उतना ही बड़ा है। यहां 14 हजार से ज्यादा वेश्याएं रहती हैं।
सोनागाछी की गलियों में खेलते हुए बच्चे, मेकअप करती महिलाएं और कमरों में इंतजार करती औरतें आम देखने को मिलती है। यहां कई मंजिलों में वेश्यालय चलते हैं। इस धंधे में कुछ औरतें मजबूरी की वजह से शामिल होती हैं तो कइयों को जबरदस्ती इस धंधे में घसीटा जाता है। एक बार कोई औरत इस दलदल में फंस गई तो इसका यहां से बाहर निकल पाना मुश्किल होता है। वहीं सालों से रहने वाली औरतों ने देह व्यापार को ही जिंदा रहने का और इस जगह पर जिंदगी बिताने की मंजिल समझ ली है।
कोलकाता को सिटी ऑफ ज्वॉय बोला जाता है लेकिन इस जगह पर पसरी रहती है निराशा और औरतों के मनों में उनके बच्चों के लिए आशा कि वो यहां ना रहें और कुछ सही बनें।
यूं तो वेश्यालयों और वेश्याओं पर कई तरह की फिल्में बन चुकी हैं। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि कोलकाता के इस रेडलाइट एरिया को विषय बनाकर एक फिल्म भी बनी है। Born Into Brothels नाम की इस फिल्म को ऑस्कर सम्मान भी मिल चुका है।
इसे दुर्भाग्य कहना गलत होगा क्योंकि यह तो उससे भी कहीं आगे है, जिस उम्र में हमारी मां हमें दुनिया की रीति-रिवाज, लाज-शरम सिखाती हैं वहीं यहां कि बच्चियां खुद को बेचना सीखती हैं। 12 से 17 साल की उम्र में ये लड़कियां मर्दों के साथ सोना सीख जाती हैं। उन्हें खुश करना सीख जाती हैं, जिसके बदले उन्हें 2 डॉलर यानि 124 रुपए मिलते हैं। इन रूपयों के बदले यहां की औरतें तश्तरी का खाना बनकर मर्दों की टेबल पर बिछ जाती हैं। इस स्लम में किसी बाहरी व्यक्ति का आना मना है। यहां तक की पत्रकारों और फोटोग्राफरों को भी ये लोग भीतर नहीं आने देते।
एक कहानी जो आपको हिला के रख देगा.....
सोनागाछी (कोलकाता) रेड लाइट क्षेत्र में अपनी टीम के साथ खड़ा वहां हो रहे मोल भाव को देख रहा था। मानव जिस्म की बोली लगाई जा रही थी और बोली के बाद कोई बहकते, कोई लड़खड़ाते तो कोई सधे हुए कदमों के साथ अंधेरे की ओर खुलने वाले दरवाजों में लुप्त हो रहा था। दरवाजों पर पंक्तिबद्ध खड़ी औरतें हमें भी इशारा कर रही थी और मैं असमंजस में था कि किसके पास अपने साथी को भेजूँ और किसके पास नही। टीम के सभी सदस्य मेरी ओर देख रहे थे और मैं रात के अंधेरे में बल्बों की रोशनी में सजने वाले इस देह बाजार को देख रहा था।
सहसा अपनी अंगुलियों पर किसी बच्चे का स्पर्श पाकर मैं चौका। कोई 6-7 साल की बच्ची थी। ‘‘दीदी-दीदी ! मेरी दीदी है ना वो आपको बुला रही है।’’ लड़की ने बड़ी ही मासूमियत से कहा।
‘‘कहां है आपकी दीदी?’’ मैंने आश्चर्य से उसको देखते हुए पूछा।
‘‘वो वहां... अंदर... थोड़ा-सा भीतर रहती है’’ बच्ची ने बताया।
‘‘लेकिन बेटा वो हमे क्यों बुला रही है?’’
‘‘अंकल वो बहुत अच्छी हैं! मुझे पैसे भी देती है। इसलिए।’’ लड़की भोलेपन से कह गई।
लड़की अपनी बहन के लिए ग्राहक ढ़ूढ़ने आई थी? सोचते ही शरीर में सिर से पांव तक सिरहन दौड़ गई। हे भगवान इस अबोध को अभी ज्ञान हो आया है? मैं सोचने लगा।
‘‘चलो न, चलो ना प्लीज। फिर मुझे खाना भी खाना है, चलो ना प्लीज।’’ कहकर वह मेरा हाथ खींचने लगी। मैंने अपने टीम के बाकी सदस्यों की ओर देखा तो उनमें से एक बोला, ‘‘ मैं जाता हूँ , आप यहीं इंतजार करो।’’
‘‘नई जगह है यार, मैं अकेला नहीं भेजूँगा तुझे।’’ जब मैंने कहा तो उसके साथ मेरी टीम में से एक और व्यक्ति तैयार हो गया, और वो जब चलने लगे तो बच्ची का चेहरा खिल गया। कूदती, फुदकती गिलहरी-सी वो कई गलियों से होते हुए उन्हें एक घर के आगे ले गई और एक परिचित सी दस्तक देकर उनकी ओर देखकर हंसने लगी। पीले व काले दांतों में फंसे कुछ गुटखे के अंश साफ दिख रहे थे। तभी दरवाजा खुला और एक अधेड़ सा आदमी बाहर निकला।
अंदर 10-12 कमरे थे पर सारे ही बाहर से बंद थे। साफ था कि वहाँ कोई और नहीं है। मेरा एक साथी बाहर उस व्यक्ति के पास बैठ गया और लड़की एक साथी को भीतर एक कमरे की ओर दीदी! दीदी! चिल्लाती हुई ले बढ़ी। भीतर से भी एक जनानी आवाज "आई-हां भीतर ले आ।"
वो कमरे में दाखिल हुआ तो एक 28-30 वर्षीय औरत की ओर इशारा करती हुई वह लड़की बोली, ‘‘ये है मेरी दीदी।’’
कहकर उसको वहीं छोड़कर बच्ची बाहर चली गई। वो उसे बाहर जाता देखता रहा। तभी वह औरत बोली "बैठिए।" उसने उसकी ओर देखा तो वह मुस्कराती हुई बैड पर बैठने का ईशारा कर रही थी। वो बैठ गया।
‘‘पानी लेंगे आप?’’ औरत ने पूछा।
‘‘जी नहीं शुक्रिया।’’ प्यास लगी होने के बावजूद भी उसने मना कर गया।
‘‘ठीक है फिर पहले पैसे दीजिए।’’ मुस्कुराहट गंभीरता में बदल गई थी।
‘‘कितने?’’ उसने पर्स निकालते हुए कहा।
‘‘500 मेरे और 100 बाहर बैठे दरबान के।’’
उसने 600 रुपए निकालकर उसकी और बढ़ा दिए। उसने लिए और एक पोस्टर के सामने खड़ी होकर माथे से लगा लिए।
‘‘ये गुड़िया आपकी छोटी बहन है?’’ उसने पूछा !
‘‘क्यों?’’ उसने बिल्कुल ऐसा दर्शाया जैसे उसे ऐसे सवाल की उससे उम्मीद नहीं थी।
‘‘देखो!’’ मैं उस इरादे से यहां नहीं आया हूं बल्कि कुछ बताने आया हूं। उसने थोड़ा सा हकलाते हुए कहा।
‘‘तो फिर किस इरादे से आये हो?’’ उसकी आंखों की चमक और बढ़ गई।
‘‘असल में मैं दिल्ली से आया हूं और हमारी संस्था आप जैसे लोगों की शादी करवाती है।’’ आप ये धंधा छोड़ दो और शादी कर लो!’’ वो एक ही सांस में कह गया।
‘‘शादी, किससे? हमारी हर रोज कितनी ही शादियां होती हैं साहब! किसी से घंटे के लिए तो किसी से रात के लिए। हमें क्या जरूरत है शादी की? आप टाईम खोटी ना करो। काम निपटाओ और जाओ। मेरा बोहणी का टाईम है।’’ पता नहीं कितने भाव इन वाक्यों के दौरान उसके चेहरे पर आए और गए।
‘‘कोई बात नहीं बहन आप घंटे के पैसे ले लो लेकिन बात तो सुन लो।’’ उसने जेब से पर्स निकालते हुए कहा और 100-100 के दो नोट उसकी ओर बढ़ा दिए। वह थोड़ी देर नोटों को देखती रही। शायद सोच रही थी कि रखे या ना रखे, पर फिर उसने रख लिए।
‘‘हां! सुना, क्या सुनाना है।’’ उसके पास बैठते हुए वह बोली।
‘‘तुम शादी कर लो ना?’’ उसने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा।
‘‘मैं शादीशुदा हूं। जिसने दरवाजा खोला था वो पति है मेरा।’’ उसने बताया तो उसके पांव के नीचे की जमीन खिसक गई।
‘‘और ये बच्ची?’’ उसने फटी आंखों से पूछा।
‘‘ये.......ये मेरी बेटी है।’’उसने आत्म विश्वास के साथ कहा।
‘‘बेटी?’’ तो आपको दीदी क्यों कहती है?’’ उसने फिर आश्चर्य भरे लहजे में पूछा?
‘‘मैने ही सिखाया है! मैंने मां शब्द इसको कभी रटाया ही नहीं। शुरू से ही दीदी कहलाया है इससे।’’ औरत ने बताया।
"क्यों ?" उसने एकदम पूछा।
‘‘क्योंकि ये लोगों को जाकर कहेगी कि मेरी मां बुला रही है तो कौन आएगा यहां?’’ सवाल का जवाब सवाल में ही दे गई वह औरत और मेरे साथी का दिमाग लगभग सुन्न-सा हो गया।
‘‘प......पानी मिलेगा थोड़ा।’’ उसने कहा तो वह औरत बाहर चली गई। वो सोच रहा था कि कैसी विडम्बना है ये ? कैसा संसार है जहाँ एक बच्ची से उसकी माँ ने माँ कहने का हक़ भी छीन लिया। थोड़ी देर बाद पानी का गिलास लेकर वापिस आई और उसको पानी थमा दिया।
‘‘इस बाजार का यही उसूल है साहब! हमारी लड़कियां सिर्फ हमारी होती हैं। उनके बाप का हमें भी पता नहीं होता। वेश्या की लड़कियां वेश्या ही बनती हैं और वेश्या के लड़के दलाल बन जाते हैं। फिर किसी दलाल से शादी कर उसे अलग कर दिया जाता है और वो उसके यहां धंधे पर लग जाती है। यही तो उसूल है इस सोनागाछी बाजार का।’’ औरत ने संक्षेप में इस बाजार का इतिहास वर्तमान और भविष्य एक साथ दिखा दिया।
‘‘तुुम लोग छोड़ क्यों नहीं देते ये धंधा?’’ मेरे साथी ने पूछा।
‘‘पुश्तैनी धंधा है साहब! इसके सिवा कुछ और आता भी नहीं।’’ औरत बोली
‘‘और हां साहब! यहां इस बात का जिक्र किसी दलाल के सामने या कहीं और मत करना। आपके लिए खतरनाक हो सकता है।’’ औरत ने उसको हमदर्दी दिखाते हुए नई सीख दी।
तभी बाहर दस्तक हुई।
बच्ची चिल्लाई ‘‘दीदी टाइम हो गया है।’’ वो फिर हिल गया उस मासूम की आवाज सुनकर।
‘‘सुनो इस बच्ची का नाम क्या है!’’ मेरे साथी ने पूछा।
‘‘पूजा।’’
‘‘ इसके बारे में सोचा है कुछ?’’ उसने पूछा।
‘‘इसका क्या सोचना? मेरी बेटी मेरा ही धंधा करेगी और मेरा सहारा बनेगी। आप फालतू में अपना टाइम बर्बाद कर रहे हो साहब! ’’ औरत ने कहा तो वो खड़ा हो गया और बाहर निकल आया। बाहर बच्ची हसरत भरी निगाहों से उसको देख रही थी।
‘‘मेरी बख्शिश?’’ बच्ची ने हाथ फैलाकर चहकते हुए कहा तो मेरे साथी का गला रूंध गया।
‘‘क......क्या चाहिए?’’ खुद पे काबू करते हुए उसने कहा।
‘‘50 रुपए।’’ उसने मुस्कुराकर कहा।
‘‘आह!’’ लंबी सांस खींचते हुए उसने 500 रुपए उसकी हथेली पर रख दिए।
‘‘चल अब आपको छोड़कर आती हूं......’’! कहकर वह फुदकती हुई उनके आगे-आगे हो ली। चार गलियां बदलने के बाद वह बोली, ‘‘अंकल अब आप सीधे चले जाना, वो सामने बड़े खंभे के पास से ही मैं आपको लेकर गई थी। ठीक है?’’ अपनी छोटी सी हथेली आगे करके उसने तसल्ली के लहजे से कहा।
‘‘हां ठीक है बेटा!’’ मेरे साथी ने भी उसे देखकर कहा।
‘‘ओके बाए।’’ कहकर वह चिड़िया-सी फुदकती हुई फिर वापिस हो ली। और हम सब उस चौराहे पर खड़े - खड़े इस भविष्य की वेश्या को तब तक देखते रहे जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हुई।
- मीत सेहरावत, एक अनुभव 2011.
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Mujko bhi sonagachi ka jism lutna hai
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