मधेपुरा/बिहार: भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय(BNMU) में कार्यरत यूएमआईएस(UMIS) कंपनी आईटीआई में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अराजकता का मामला तूल पकड़ता जा रहा है,और इसको लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी है। जब से बीएनएमयू के सीनेट-सिंडिकेट सदस्य डाॅ. जवाहर पासवान ने यूएमआईएस(UMIS) के पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच हेतु कुलपति डाॅ. ज्ञानंजय द्विवेदी को आवेदन दिया है, तब से यह मामला और भी गर्मा गया है।
डाॅ. जवाहर पासवान के आवेदन के संबंध में तत्कालीन कुलपति(VC) डाॅ. अवध किशोर राय एवं तत्कालीन प्रति कुलपति(PVC) डाॅ. फारूक अली ने भी मीडिया में बयान दिया है और डाॅ. जवाहर के आरोपों का खंडन किया है। तत्कालीन कुलपति ने कहा है कि डाॅ. जवाहर पासवान वर्चस्व स्थापित करने के लिए ऐसा कर रहे हैं। इस पर डाॅ. जवाहर ने कहा है कि यहाँ वर्चस्व की कोई बात नहीं है। वे यहां के शिक्षक, पूर्ववर्ती विद्यार्थी एवं नागरिक भी हैं। वे किसी भी कीमत पर बीएनएमयू के विद्यार्थियों का आर्थिक एवं मानसिक दोहन नहीं होने देंगे।
इधर,
तत्कालीन प्रति डाॅ. फारूक अली ने कहा है कि "विश्वविद्यालय में हर जगह झूठ बोलकर गलत तरीके से लाभ उठाने वाले भ्रष्ट लोगों को दूसरे का काम गलत नजर आता है। विश्वविद्यालय विकास के लिए 3 वर्ष के दौरान हम लोगों का किया गया कार्य बोलता है।"
इसका डाॅ. जवाहर ने कड़ा प्रतिवाद किया है। उन्होंने कहा है कि पूरे तीन वर्षों तक तत्कालीन प्रति कुलपति(PVC) ने कुलपति(VC) के संरक्षण में नियम-परिनियमों की धज्जियां उड़ाई हैं और वे प्रतिकुलपति(PVC) के कार्यों के खिलाफ वर्ष 2018 से ही कई बार विश्वविद्यालय में आवेदन दे चुके हैं। पुनः, वे कुलपति को आवेदन देकर पूरे तीन वर्षों तक प्रति कुलपति(PVC) द्वारा किए गए सभी कार्यों की समीक्षा करने की माँग करेंगे।
डाॅ. जवाहर पासवान ने कहा है कि प्रतिकुलपति(PVC) ने यूएमआईएस(UMIS) घोटाला, एक वर्ष बाद भी पीएटी(पैट-2019) का अंक पत्र नहीं देने तथा शिक्षकों को इसके प्रश्न-पत्र चयन एवं मूल्यांकन का पैसा नहीं देने और वर्षों से कार्यरत स्थानीय लोगों की हकमारी कर अपने चहेतों को संविदा पर बहाली की है। उनका यही सब काम बोलता है। वे अपने विदाई भाषण में भी अपने कुकर्मों को छिपाने के लिए जोर-जोर से बोलते रहे और अभी भी दूसरों पर आरोप लगा रहे हैं। प्रतिकुलपति(PVC) का बयान 'चोर बोले जोर से' कहावत का उदाहरण है।
डाॅ. जवाहर ने साफ-साफ कहा कि यूएमआईएस कंपनी आईटीआई लूट का अड्डा बन गया है। वर्तमान यूएमआईएस कंपनी आईटीआई की पूरी कार्य-प्रणाली और उसमें तत्कालीन कुलपति डाॅ. अवध किशोर राय एवं तत्कालीन प्रति कुलपति डाॅ. फारूक अली की भूमिका की भी उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। ऐसी आशंका है कि तत्कालीन कुलपति एवं तत्कालीन प्रति कुलपति ने भी इस मामले में बेजा आर्थिक लाभ लिया है। अन्यथा वे बार-बार सभी कार्यक्रमों में यूएमआईएस(UMIS) का गुणगान क्यों करते थे ?
उन्होंने कहा है कि यूएमआईएस(UMIS) की वर्तमान कंपनी ने कांट्रेक्टर के हिसाब से काम नहीं किया, इसके बावजूद उसे तीन किस्तों में लगभग एक करोड़ पंद्रह लाख रूपये भुगतान कर दिया गया है। इसकी रिकवरी होनी चाहिए।
उन्होंने कहा है कि वित्तीय परामर्शी(FA) ने भी वर्तमान यूएमआईएस(UMIS) कंपनी आईटीआई के विरूद्ध नोट ऑफ डिसेंट दिया है। इसके बावजूद विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डाॅ. अवध किशोर राय एवं तत्कालीन प्रतिकुलपति(PVC) डाॅ. फारूक अली ने यूएमआईएस(UMIS) के कांट्रेक्ट को एक वर्ष बढ़ाने का आदेश दे दिया है। यह विश्वविश्वविद्यालय के नियम-परिनियम के खिलाफ है। अतः पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों पर कार्रवाई किया जाए।
डाॅ. जवाहर ने कहा कि तत्कालीन कुलपति ने मीडिया में कहा है कि उन्होंने कांट्रेक्ट बढ़ाने का आदेश नहीं दिया है, तो फिर विश्वविद्यालय द्वारा कांट्रेक्ट बढ़ाने का पत्र कैसे जारी हुआ ? तत्कालीन कुलपति ने यह भी कहा है कि हमने पहले सिंडिकेट में यह मामला क्यों नहीं उठाया ? यहाँ सवाल यह है कि जब तत्कालीन कुलपति ने अपनी विदाई के दिन यूएमआईएस का कांट्रेक्ट बढ़ाया है, तो विरोध तो उनके जाने के बाद ही होगा न। साथ ही उसके बाद सिंडिकेट की बैठक नहीं हुई है। जब बैठक होगी, तो सिंडिकेट में भी सवाल उठाया जाएगा।
साथ ही सिंडिकेट में यह भी प्रश्न उठेगा कि जब तत्वावधान कुलपति ने आदेश नहीं दिया, तो कांट्रेक्ट वृद्धि का पत्र किसके आदेश से जारी हुआ ?


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