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बुधवार, 20 जून 2018

" सिसकती किलकारियाँ " प्रज्ञा प्रसून की बेहतरीन कविता, आप भी पढ़ें.....


सिसकती किलकारियाँ
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नए जहाँ में पंख फैलाने ,
लो आ रही हूँ मैं ,
नए नए सपनों को सजाने
माँ आ रही हूँ मैं ,
तेरी ममता की छाँव पाने
पापा की नई दुनियाँ बसाने,
माँ आ रही हूँ मैं ,
देखो आ रही हूँ मैं .....

दादाजी की प्यारी गुड़िया,
कहलाऊँगी शरारत की पुड़िया
दादी की खुशियों को बढाने,
माँ आ रही हूँ मैं ,
तुम सबके ही प्यार को पाने
लो आ रही हूँ मैं ,
देखो आ रही हूँ मैं .....

पर माँ ,क्यों रो रही है तू ,
तुझपे चीख रहे सब क्यों,
क्यों मुझे बचाने को मेरी माँ
ऐसे भाग रही है तू ......

माँ अभी कुछ हुआ मुझे
क्या किसी ने कुछ किया तुझे,
माँ क्यों चीख रही है तू ,
देखो सिहर रही हूँ मैं ,
माँ डर गयी हूँ मैं ,

माँ तकलीफ़ हो रही मुझे,
एहसास तो होगा ही तुझे ,
साँसे रुक सी रही मेरी ,
और आंखें ना खुल रही मेरी,

माँ छुराओ ना मुझे इनसे ,
मैं चीख रही हूँ कबसे,
माँ दर्द बढ रहा मेरा ,
आह जान जा रही मेरी .....

तेरी ममता की छाँव पाने ,
पापा की गोद में जाने ,
दादाजी की पीठ पे चढने ,
दादी की कहानियाँ सुनने,
को तड़प रही हूँ मैं ,
हाँ कलप रही हूँ मैं ........

माँ बिलख रही है तू ,
माँ कलप रही ना तू ,
तेरी जिगर का टुकरा मैं,
इसीलिए तड़प रही न तू ,

पापा भी तो है रो रहे,
छुपकर आँसू पोंछ रहे,
समझ गयी आप सबकी उलझन,
मुझे मानते हो पराया धन,
लगती हूँ ना बोझ तुम्हें ,
पापा जा रही हूँ मैं .....

तुम सबकी खुशियाँ लौटाने ,
लो जा रही हूँ मैं ,
तानों से तुझे मुक्ति दिलाने,
माँ जा रही हूँ मैं ,
देखो जा रही हूँ मैं ,
पापा जाने वाली मैं .....
माँ . . . जा चुकी हूँ मैं .....
       





प्रज्ञा प्रसून
कटिहार ,बिहार

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