सुनहरे भविष्य की चाहत में देश के मध्यम वर्गीयपरिवार के बच्चे कड़ी मेहनत करके देश के उच्च संस्थानों में प्रवेश पाना चाहते हैं। ज्यादा नंबर लाने वाला छात्र ही बढ़िया कॉलेजों या संस्थानों में प्रवेश पाने में सफल हो पाते हैंक्योंकि वहां से करियर में शत प्रतिशत सफलता कीगारंटी के साथ उन्नति की संभावनाएं भी अधिक और जल्दी होती है। हालांकि ऊंचे लक्ष्य प्राप्त करने के लिए टॉप स्कूलों से शिक्षित होना सफलताका मापदंड नहीं है। यह साबित करते हैं हमारी आजकी कहानी के 7 सुपरहीरो।
(1) 15वर्ष की उम्र में परिस्थितिवश स्कूल छोड़ कर भी आज खड़ा कर चुके हैं साढ़े चार अरब डॉलर का साम्राज्य
सुभाष चंद्रा का जन्म हिसार हरियाणा में 1950में हुआ था। कुशल व्यवसायी बनने का गुण उनके स्वाभाव में था। विभिन्न राज्यों में अनाज सप्लाई के उनके पारिवारिक व्यवसाय को 1965 में जबरदस्त झटका झेलना पड़ा। परिवार का बड़ा बेटा होने के नाते उस समय पढ़ाई छोड़कर अपने पारिवारिक व्यवसाय को संभालना उनकी जिम्मेदारी थी, जिसे उन्होंने बखूबी पूरा किया। शुरूआत में फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया के मुश्किल कार्य संभालकर उन्होंने परिवार की जरूरतों को पूरा किया। दूसरी ओर एसेल पेकेजिंग के नाम से टूथपेस्ट की पैकिंग के साथ-साथ 1989में मुंबई में एसेल वर्ल्ड के नाम से एम्यूसमेंट पार्क बनाया। जिसकी सफलता ने जी टीवी के लिए 1992 में रास्ते खोले और सुभाष चंद्रा ने सफलता की सीढ़ी चढ़नी शुरू कर दी। आज जी नैटवर्क 167 देशों में 500 करोड़ दर्शकों के साथ बुलंदियों पर है, जिसका साढ़े चार अरब के आसपास है। वर्तमान में सुभाष चंद्रा हरियाणा से राज्यसभा सांसद भी हैं।
2) एक भूमिहीन किसान का बेटा जो रंक से राजा
बना
तमिलनाडु के बेहद गरीब किसान परिवार में जन्मे अरोकियास्वामी वेलुमनीने मद्रास से विज्ञान विषय में स्नातक डिग्री लेने के बाद कैमिस्ट कीनौकरी जिस कंपनी में की, वह कंपनी तीन साल बाद बंद हो गई। इसके बाद भाभा रिसर्च सेंटर में लैब असिस्टेंट की नौकरी मिल गई। अपनी कुशल कार्यक्षमता और कर्मठता के बल पर वह लगातार प्रगति करते रहे। 14 वर्ष के कार्यकाल में परास्नातक की डिग्री के साथ थायराइड बायोकैमिस्टी में पीएचडी पूरी की और एक सफल वैज्ञानिक के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाई। 1996 में 2 लाख रुपए की लागत से उन्होंने अपनीपत्नी के साथ मिलकर थायरोकेयर की स्थापना की। दो साल के भीतर ही थायरोकेयर का टर्नओवर बढ़कर दो करोड़ तक पहुंच गया और देश की सबसे बड़ी थायरॉयड टेसिटंग लैब बन गई। आज 1200 शाखाओं के साथ यह भारत में टेस्टिंग लैब की सबसे लंबी श्रृंखला में शामिल है। वर्तमान में 3377 करोड़ के मूल्यांकन के साथ यह कंपनी सफलता के चरम पर है।
3) कैलकुलेटर रिपेयर करने से 800 करोड़ की कंपनी तक का सफर
महाराष्ट्र के मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मेकैलाश काटकरको पैसे की मजबूरी के चलते दसवीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ना पड़ा। कैलकुलेटर रिपेयर का काम सीखकर एक दुकान पर नौकरी करने लगे। कैलकुलेटर के साथ अन्य उपकरण ठीक करना भी सीखते रहे। एक उज्ज्वल व्यवसाय की संभावना देखकर उन्होंने 1990 में छोटी सी बचत से अपनी दुकान खोली। भविष्य में कंप्यूटर के बढ़ते वर्चस्व को भांपकर उन्हें कंप्यूटर रिपेयरिंग में बहुत संभावनाएं लगी, इसलिए उन्होंने कंप्यूटर रिपेयर का काम भी सीख लिया। अपने छोटेभाई के साथ कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर रिपेयर के क्षेत्र में सफलता मानो उनके लिए प्रतीक्षारत थी। आज क्विकहील एंटी वायरस का टर्नओवर लगभग 12 देशों में मिलाकर 800 करोड़ से पार है।
4) वाशिंग पाउडर निरमा से साढ़े तीन अरब का साम्राज्य बनाया
गुजराती किसान परिवार में जन्मेकर्सनभाई पटेलने अपनी स्नातक की डिग्री लेने के बाद गुजरात सरकार के जियोलॉजी खनन विभाग में काम करना आरंभकर दिया। 1969 में घर पर ही डिटरजेंट बनाकर साइकिल से घर-घर बेचना शुरू किया। निरमा डिटरजेंट के निर्माता पटेल भाई ने उस समय जबकि मल्टीनेशनल कंपनियां भारतीय बाजारों में महंगे डिटरजेंट बेच रही थीं, तब 3 रुपए किलो की लागत से बने अपने डिटरजेंट को 12 रुपए किलो से बेचकर अपनी स्वर्गीय पुत्री निरमा के नाम को ब्रांड के रूप में स्थापित कर एक अलग पहचान बनाई। लोगों में बढ़ती लोकप्रियता ने निरमा को आगे बढ़ने का अवसर प्रदान किया। आज पटेल भाई की कंपनी का मूल्यांकन भारतीय बाजार में लगभग साढ़े तीन अरब है।
5) बचत की खोज में मिल गया बिज़नेस आइडिया
ओयो रूम्स के सीईओ ओडिशा केरीतेश अग्रवालने शौकिया तौर पर मात्र 8 वर्ष की उम्र में कोडिंगसीखी। 2009 में रीतेश ने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा के लिए कोटा की तरफ रूख किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। रीतेश को घूमने का शौक था तो अपने जेब खर्च से पैसे बचाकर घूमना और सस्ते बजट होटलों में रूकना उन्हें पसंद था। 2011 में दिल्ली में वह अपना व्यापार शुरू करने की इच्छा से आए। ओरेवल स्टेस के नाम से 2012 में अपनी कंपनी शुरू की और 2013 में इसे ओयो रूम्सके नाम से दोबारा शुरू किया। ग्राहकों की बचत के अनुसार उनकीपहुंच में आने वाले होटल के कमरे मुहैया करना ओयो रूम्स का लक्ष्य था। भारतके 230 शहरों की पहली पसंद बनने वाली ओयो कंपनी ने अब मलेशिया और नेपाल की ओर अपने कदम बढ़ाए हैं। कंपनी की वार्षिक आय भारतीय बाजार में लगभग 38 करोड़ आंकी गई है।
6) अपनी सफलता के स्वयं निर्माता
1983 में जन्मेकुणाल शाहके पिता एक व्यापारी हैं। स्नातक की डिग्री लेने के बाद एमबी ए करने के लिए कुणाल ने नरसी मोंजी यूनिवर्सिटी में प्रवेश तो ले लिया लेकिन पूरा करने से पहले ही एक बीपीओ में जॉब करना उन्हें ज्यादा बेहतर लगा। कंपनी के मालिक संदीप टंडन का दिल कुणाल ने अपने काम से जीत लिया, जल्दी ही वह कंपनी के बिज़नेस हेड बन गए। 2010 में जब कुणाल ने संदीप से अपना व्यापार शुरू करने का आइडिया शेयर किया, तो संदीप ने उन्हें साझेदारीका प्रस्ताव दिया जिसे कुणाल ने स्वीकार कर लिया। फ्रीचार्ज के नाम से उन्होंने अपनी कंपनी की शुरूआत की जिसमें मोबाइल और डाटा कार्ड रिचार्ज करने वाले ग्राहकों को डिस्काउंट कूपन दिए जाते हैं। 2013 तक उनकी कंपनी के पास 20 लाख ग्राहकों का प्लेटफार्म तैयार हो चुका था। नामचीन ब्रांड जैसे मोबीविक,पेटीएम ने फ्रीचार्ज से हाथ मिलाया। 2015 मेंस्नैपडील ने 45 करोड़ रुपए में कंपनी का अधिग्रहण कर लिया।
7) बजट फ्रैंडली डी मार्ट है लाखों लागों की पसंद
पिता के देहांत के कारण मुंबई यूनिवर्सिटी से अधूरी स्नातक की डिग्री लेकर आधे-अधूरे मन से स्टॉक एक्सचेंज व्यापार में भी दलाल स्टीट में अपनी अलग पहचान बनाने वालेराधाकृष्ण दमानीने सालों तक स्टॉक एक्सचेंज में ब्रोकर की सफल भूमिका में काम किया लेकिन उनकी असली मंज़िल औरचाहत कुछ और ही थी। रीटेल व्यापार के माध्यम से घरेलू जरूरत का सामान एक ही छत के नीचे लाकर नए व्यापार में उन्हें बड़ी संभावनाएं दिख रही थीं। 2001 में डी मार्ट की स्थापना की और जनरलस्टोर से कम मूल्य पर बढ़िया क्वालिटी के सामानकी व्यवस्थाकी गई। अलग-अलग डिस्काउंट योजनाओं के साथ लोगों के घरों एवं दिलों में जगह बनाते हुए 25 राज्यों में डी मार्ट अपना कारोबार फैला चुकी है। भारतीय बाजार में इसका मूल्यांकन 1000 करोड़ आंका गया है।
उपरोक्त सभी हस्तियां किताबी ज्ञान से ज्यादा व्यावहारिक ज्ञान रखते हैं और परिस्थितियों केकारण जो निर्णय उन्हें अपने जीवन में लेने पड़ेउसमें उनका व्यवहारिक ज्ञान ही काम आया। आज देशके उच्च संस्थानों आई आई टी, आई आई एम से पास आउटइनके कर्मचारियों के रूप में कार्यरत हैं। यह सिखाता है कि जब एक रास्ता हमारे लिए बंद होता है. तभी दूसरे कई रास्ते हमारे समक्ष खुलते हैं जहां सपने और लक्ष्य पूरी होने की संभावना ज्यादा होती है।
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सौजन्य- kenifolis Hindi
(1) 15वर्ष की उम्र में परिस्थितिवश स्कूल छोड़ कर भी आज खड़ा कर चुके हैं साढ़े चार अरब डॉलर का साम्राज्य
सुभाष चंद्रा का जन्म हिसार हरियाणा में 1950में हुआ था। कुशल व्यवसायी बनने का गुण उनके स्वाभाव में था। विभिन्न राज्यों में अनाज सप्लाई के उनके पारिवारिक व्यवसाय को 1965 में जबरदस्त झटका झेलना पड़ा। परिवार का बड़ा बेटा होने के नाते उस समय पढ़ाई छोड़कर अपने पारिवारिक व्यवसाय को संभालना उनकी जिम्मेदारी थी, जिसे उन्होंने बखूबी पूरा किया। शुरूआत में फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया के मुश्किल कार्य संभालकर उन्होंने परिवार की जरूरतों को पूरा किया। दूसरी ओर एसेल पेकेजिंग के नाम से टूथपेस्ट की पैकिंग के साथ-साथ 1989में मुंबई में एसेल वर्ल्ड के नाम से एम्यूसमेंट पार्क बनाया। जिसकी सफलता ने जी टीवी के लिए 1992 में रास्ते खोले और सुभाष चंद्रा ने सफलता की सीढ़ी चढ़नी शुरू कर दी। आज जी नैटवर्क 167 देशों में 500 करोड़ दर्शकों के साथ बुलंदियों पर है, जिसका साढ़े चार अरब के आसपास है। वर्तमान में सुभाष चंद्रा हरियाणा से राज्यसभा सांसद भी हैं।
2) एक भूमिहीन किसान का बेटा जो रंक से राजा
बना
तमिलनाडु के बेहद गरीब किसान परिवार में जन्मे अरोकियास्वामी वेलुमनीने मद्रास से विज्ञान विषय में स्नातक डिग्री लेने के बाद कैमिस्ट कीनौकरी जिस कंपनी में की, वह कंपनी तीन साल बाद बंद हो गई। इसके बाद भाभा रिसर्च सेंटर में लैब असिस्टेंट की नौकरी मिल गई। अपनी कुशल कार्यक्षमता और कर्मठता के बल पर वह लगातार प्रगति करते रहे। 14 वर्ष के कार्यकाल में परास्नातक की डिग्री के साथ थायराइड बायोकैमिस्टी में पीएचडी पूरी की और एक सफल वैज्ञानिक के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाई। 1996 में 2 लाख रुपए की लागत से उन्होंने अपनीपत्नी के साथ मिलकर थायरोकेयर की स्थापना की। दो साल के भीतर ही थायरोकेयर का टर्नओवर बढ़कर दो करोड़ तक पहुंच गया और देश की सबसे बड़ी थायरॉयड टेसिटंग लैब बन गई। आज 1200 शाखाओं के साथ यह भारत में टेस्टिंग लैब की सबसे लंबी श्रृंखला में शामिल है। वर्तमान में 3377 करोड़ के मूल्यांकन के साथ यह कंपनी सफलता के चरम पर है।
3) कैलकुलेटर रिपेयर करने से 800 करोड़ की कंपनी तक का सफर
महाराष्ट्र के मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मेकैलाश काटकरको पैसे की मजबूरी के चलते दसवीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ना पड़ा। कैलकुलेटर रिपेयर का काम सीखकर एक दुकान पर नौकरी करने लगे। कैलकुलेटर के साथ अन्य उपकरण ठीक करना भी सीखते रहे। एक उज्ज्वल व्यवसाय की संभावना देखकर उन्होंने 1990 में छोटी सी बचत से अपनी दुकान खोली। भविष्य में कंप्यूटर के बढ़ते वर्चस्व को भांपकर उन्हें कंप्यूटर रिपेयरिंग में बहुत संभावनाएं लगी, इसलिए उन्होंने कंप्यूटर रिपेयर का काम भी सीख लिया। अपने छोटेभाई के साथ कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर रिपेयर के क्षेत्र में सफलता मानो उनके लिए प्रतीक्षारत थी। आज क्विकहील एंटी वायरस का टर्नओवर लगभग 12 देशों में मिलाकर 800 करोड़ से पार है।
4) वाशिंग पाउडर निरमा से साढ़े तीन अरब का साम्राज्य बनाया
गुजराती किसान परिवार में जन्मेकर्सनभाई पटेलने अपनी स्नातक की डिग्री लेने के बाद गुजरात सरकार के जियोलॉजी खनन विभाग में काम करना आरंभकर दिया। 1969 में घर पर ही डिटरजेंट बनाकर साइकिल से घर-घर बेचना शुरू किया। निरमा डिटरजेंट के निर्माता पटेल भाई ने उस समय जबकि मल्टीनेशनल कंपनियां भारतीय बाजारों में महंगे डिटरजेंट बेच रही थीं, तब 3 रुपए किलो की लागत से बने अपने डिटरजेंट को 12 रुपए किलो से बेचकर अपनी स्वर्गीय पुत्री निरमा के नाम को ब्रांड के रूप में स्थापित कर एक अलग पहचान बनाई। लोगों में बढ़ती लोकप्रियता ने निरमा को आगे बढ़ने का अवसर प्रदान किया। आज पटेल भाई की कंपनी का मूल्यांकन भारतीय बाजार में लगभग साढ़े तीन अरब है।
5) बचत की खोज में मिल गया बिज़नेस आइडिया
ओयो रूम्स के सीईओ ओडिशा केरीतेश अग्रवालने शौकिया तौर पर मात्र 8 वर्ष की उम्र में कोडिंगसीखी। 2009 में रीतेश ने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा के लिए कोटा की तरफ रूख किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। रीतेश को घूमने का शौक था तो अपने जेब खर्च से पैसे बचाकर घूमना और सस्ते बजट होटलों में रूकना उन्हें पसंद था। 2011 में दिल्ली में वह अपना व्यापार शुरू करने की इच्छा से आए। ओरेवल स्टेस के नाम से 2012 में अपनी कंपनी शुरू की और 2013 में इसे ओयो रूम्सके नाम से दोबारा शुरू किया। ग्राहकों की बचत के अनुसार उनकीपहुंच में आने वाले होटल के कमरे मुहैया करना ओयो रूम्स का लक्ष्य था। भारतके 230 शहरों की पहली पसंद बनने वाली ओयो कंपनी ने अब मलेशिया और नेपाल की ओर अपने कदम बढ़ाए हैं। कंपनी की वार्षिक आय भारतीय बाजार में लगभग 38 करोड़ आंकी गई है।
6) अपनी सफलता के स्वयं निर्माता
1983 में जन्मेकुणाल शाहके पिता एक व्यापारी हैं। स्नातक की डिग्री लेने के बाद एमबी ए करने के लिए कुणाल ने नरसी मोंजी यूनिवर्सिटी में प्रवेश तो ले लिया लेकिन पूरा करने से पहले ही एक बीपीओ में जॉब करना उन्हें ज्यादा बेहतर लगा। कंपनी के मालिक संदीप टंडन का दिल कुणाल ने अपने काम से जीत लिया, जल्दी ही वह कंपनी के बिज़नेस हेड बन गए। 2010 में जब कुणाल ने संदीप से अपना व्यापार शुरू करने का आइडिया शेयर किया, तो संदीप ने उन्हें साझेदारीका प्रस्ताव दिया जिसे कुणाल ने स्वीकार कर लिया। फ्रीचार्ज के नाम से उन्होंने अपनी कंपनी की शुरूआत की जिसमें मोबाइल और डाटा कार्ड रिचार्ज करने वाले ग्राहकों को डिस्काउंट कूपन दिए जाते हैं। 2013 तक उनकी कंपनी के पास 20 लाख ग्राहकों का प्लेटफार्म तैयार हो चुका था। नामचीन ब्रांड जैसे मोबीविक,पेटीएम ने फ्रीचार्ज से हाथ मिलाया। 2015 मेंस्नैपडील ने 45 करोड़ रुपए में कंपनी का अधिग्रहण कर लिया।
7) बजट फ्रैंडली डी मार्ट है लाखों लागों की पसंद
पिता के देहांत के कारण मुंबई यूनिवर्सिटी से अधूरी स्नातक की डिग्री लेकर आधे-अधूरे मन से स्टॉक एक्सचेंज व्यापार में भी दलाल स्टीट में अपनी अलग पहचान बनाने वालेराधाकृष्ण दमानीने सालों तक स्टॉक एक्सचेंज में ब्रोकर की सफल भूमिका में काम किया लेकिन उनकी असली मंज़िल औरचाहत कुछ और ही थी। रीटेल व्यापार के माध्यम से घरेलू जरूरत का सामान एक ही छत के नीचे लाकर नए व्यापार में उन्हें बड़ी संभावनाएं दिख रही थीं। 2001 में डी मार्ट की स्थापना की और जनरलस्टोर से कम मूल्य पर बढ़िया क्वालिटी के सामानकी व्यवस्थाकी गई। अलग-अलग डिस्काउंट योजनाओं के साथ लोगों के घरों एवं दिलों में जगह बनाते हुए 25 राज्यों में डी मार्ट अपना कारोबार फैला चुकी है। भारतीय बाजार में इसका मूल्यांकन 1000 करोड़ आंका गया है।
उपरोक्त सभी हस्तियां किताबी ज्ञान से ज्यादा व्यावहारिक ज्ञान रखते हैं और परिस्थितियों केकारण जो निर्णय उन्हें अपने जीवन में लेने पड़ेउसमें उनका व्यवहारिक ज्ञान ही काम आया। आज देशके उच्च संस्थानों आई आई टी, आई आई एम से पास आउटइनके कर्मचारियों के रूप में कार्यरत हैं। यह सिखाता है कि जब एक रास्ता हमारे लिए बंद होता है. तभी दूसरे कई रास्ते हमारे समक्ष खुलते हैं जहां सपने और लक्ष्य पूरी होने की संभावना ज्यादा होती है।
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