संपादक- आर. कुमार
बीएन मंडल विश्वविद्यालय परिसर में मंगलवार को भूपेंद्र नारायण मंडल की 43वीं पुण्यतिथि श्रद्धापूर्वक मनाई गई। विवि में भूपेंद्र बाबू के प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर प्रति कुलपति डॉ. फारूक अली ने कहा कि भूपेन्द्र बाबू समाजवाद के जीते-जागते मिशाल थे। उन्होंने समाजवाद को अपने जीवन में आत्मसात कर लिया था। वे राम मनोहर लोहिया के करीबी रहे थे। उन्होंने समाज के अंतिम व्यक्ति के हित में काम किया। वे जाति नहीं, जमात के नेता थे। मौके पर प्रतिकुलपति ने छात्र एवं शिक्षकों से भूपेन्द्र बाबू के सपनों को साकार करने का आह्वान किया। साथ ही कहा कि सभी उनके विचारों को जीवन में उतारें। उनके नाम पर स्थापित बीएनएमयू को राष्ट्रीय पहचान दिलाने हेतु अथक प्रयास करें। इस अवसर पर वित्त परामर्शी सुरेश चन्द्र दास, प्रभारी कुलानुशासक डॉ. अरूण कुमार यादव, परिसंपदा पदाधिकारी डॉ शैलेन्द्र कुमार, डाॅ. दीनानाथ मेहता, वासुदेव प्रसाद, कुलपति के निजी सहायक शंभु नारायण यादव, प्रति कुलपति के सहायक राजेश कुमार, अखिलेश्वर नारायण, संतोष कुमार, दयानंद, पीआरओ डॉ. सुधांशु शेखर सहित अन्य उपस्थित थे।
कार्यक्रम के दौरान भूपेंद्र बाबू के प्रतिमा पर माल्यार्पण कर कुलसचिव डॉ नरेंद्र श्रीवास्तव ने उनके जीवनी पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बीएन मंडल का जन्म रानीपट्टी स्टेट के जमींदार बाबू जयनारायण मंडल और दानावती देवी के घर 1 फरवरी 1904 को हुआ था। इनकी शिक्षा रानीपट्टी, मधेपुरा, मुंगेर भागलपुर व पटना में संपन्न हुई। 1930 में वकालत पेशा के साथ ही उन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन आरंभ किया। महात्मा गांधी के आह्वान पर 1921 से बीएन मंडल ने असहयोग आंदोलन में छात्रों का नेतृत्व किया था।
कुलसचिव ने कहा कि 13 अगस्त 1942 को मधेपुरा स्थित ट्रेजरी बिल्डिंग पर तिरंगा फहराने वाले भूपेंद्र बाबू ने गांधी जी की हत्या के बाद वर्ष 1949 में गठित सोशलिस्ट पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसी क्रम में 1953 में टीपी कॉलेज मधेपुरा की स्थापना की गई। इस महाविद्यालय की स्थापना कालांतर में बीएनएमयू निर्माण का आधार बना और जिला मुख्यालय स्थित स्टेडियम का नाम भी इन्हीं के नाम पर रखा गया। 1968 में और1972 में बड़े ही सम्मान के साथ इन्हें राज्य सभा के लिए चयनित किया गया। सांसद रहते हुए भूपेन्द्र बाबू ने अपनी अंतिम सांस 29 मई, 1975 को टेंगराहा (कुमारखण्ड, मधेपुरा) में ली।
बीएन मंडल विश्वविद्यालय परिसर में मंगलवार को भूपेंद्र नारायण मंडल की 43वीं पुण्यतिथि श्रद्धापूर्वक मनाई गई। विवि में भूपेंद्र बाबू के प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर प्रति कुलपति डॉ. फारूक अली ने कहा कि भूपेन्द्र बाबू समाजवाद के जीते-जागते मिशाल थे। उन्होंने समाजवाद को अपने जीवन में आत्मसात कर लिया था। वे राम मनोहर लोहिया के करीबी रहे थे। उन्होंने समाज के अंतिम व्यक्ति के हित में काम किया। वे जाति नहीं, जमात के नेता थे। मौके पर प्रतिकुलपति ने छात्र एवं शिक्षकों से भूपेन्द्र बाबू के सपनों को साकार करने का आह्वान किया। साथ ही कहा कि सभी उनके विचारों को जीवन में उतारें। उनके नाम पर स्थापित बीएनएमयू को राष्ट्रीय पहचान दिलाने हेतु अथक प्रयास करें। इस अवसर पर वित्त परामर्शी सुरेश चन्द्र दास, प्रभारी कुलानुशासक डॉ. अरूण कुमार यादव, परिसंपदा पदाधिकारी डॉ शैलेन्द्र कुमार, डाॅ. दीनानाथ मेहता, वासुदेव प्रसाद, कुलपति के निजी सहायक शंभु नारायण यादव, प्रति कुलपति के सहायक राजेश कुमार, अखिलेश्वर नारायण, संतोष कुमार, दयानंद, पीआरओ डॉ. सुधांशु शेखर सहित अन्य उपस्थित थे।
कार्यक्रम के दौरान भूपेंद्र बाबू के प्रतिमा पर माल्यार्पण कर कुलसचिव डॉ नरेंद्र श्रीवास्तव ने उनके जीवनी पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बीएन मंडल का जन्म रानीपट्टी स्टेट के जमींदार बाबू जयनारायण मंडल और दानावती देवी के घर 1 फरवरी 1904 को हुआ था। इनकी शिक्षा रानीपट्टी, मधेपुरा, मुंगेर भागलपुर व पटना में संपन्न हुई। 1930 में वकालत पेशा के साथ ही उन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन आरंभ किया। महात्मा गांधी के आह्वान पर 1921 से बीएन मंडल ने असहयोग आंदोलन में छात्रों का नेतृत्व किया था।
कुलसचिव ने कहा कि 13 अगस्त 1942 को मधेपुरा स्थित ट्रेजरी बिल्डिंग पर तिरंगा फहराने वाले भूपेंद्र बाबू ने गांधी जी की हत्या के बाद वर्ष 1949 में गठित सोशलिस्ट पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसी क्रम में 1953 में टीपी कॉलेज मधेपुरा की स्थापना की गई। इस महाविद्यालय की स्थापना कालांतर में बीएनएमयू निर्माण का आधार बना और जिला मुख्यालय स्थित स्टेडियम का नाम भी इन्हीं के नाम पर रखा गया। 1968 में और1972 में बड़े ही सम्मान के साथ इन्हें राज्य सभा के लिए चयनित किया गया। सांसद रहते हुए भूपेन्द्र बाबू ने अपनी अंतिम सांस 29 मई, 1975 को टेंगराहा (कुमारखण्ड, मधेपुरा) में ली।



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