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गुरुवार, 17 मई 2018

"लड़की का घर" प्रिया सिन्हा की बेहतरीन कविता आप भी पढ़े.....

"लड़की का घर"

"लड़की का नहीं कोई घर होता है,
कहने को तो दो-दो मगर होता है;
मायका होता है भ्रात-पिता का तो,
ससुराल का मुख्य ज्येष्ठ-ससुर व,
 उसके स्वयं का हमसफर होता है !
लड़की का नहीं कोई घर होता है !

मायके वाले कहते-
इसने तो दूजे घर जाना है;
ससुराल वाले कहते-
उसने तो दूजे घर से आना है;
मत पूछो दोस्तों इन बातों का,
लड़की पे क्या असर होता है ?
लड़की का नहीं कोई घर होता है ।

एक वक्त पर  लड़की की
शादी करा दी है जाती;
जिसे वह यही सोच कर है निभाती;
एक घर तो छूट गया,दूजा भी ना छूट जाए,
इस बात का उसको हमेशा डर होता है  !"
लड़की का नहीं कोई घर होता है ।






"प्रिया सिन्हा"
युवा साहित्यकार, लेखक, चित्रकार, पूर्णियां

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