तेरे सपनों का..........
रात के इस पहर में
ज़िंदगी के इस समर में
सोचता हूं
हां, सोचता हूं
कितनी दूर निकल
गए हम
क्या थे
कैसे हो गए हम
ऐसे कैसे हो गए हम।
पर ये खामोशी
नहीं, नहीं
लाचारी को
खामोशी का
नाम मत दो,
लाचारी
कैसी लाचारी
हां रे मन
बहुत लाचार हूं
लड़ लूंगा दुनिया से
झुका दूंगा दुनिया को
कदमों तले
मगर कैसे
सामना कर पाऊंगा
उन आंखों का
जिसने मुझे
यहां तक पहुंचाया
कैसे मिटा दूंगा
उनके ख्वाबों को
जो रोज रोज
बनते हैं
बनकर
जवान अभी अभी हुए हैं।
अब समय है
उनके सपनों को
पूरा करना
मगर मन
तुम्हारा क्या
मुझे पता है
तुम जी ही लोगे
इस भंवर में।
हो सके तो
मुझे माफ कर देना
पता है तुम मुझे
माफ कर दोगे
पर सच कहूं
मैं ताउम्र
गुनहगार रहूंगा
तेरा, तेरे सपनों का।
कवि
अतुल मल्लिक अनजान
संस्थापक संयोजक
देहाती साहित्यिक परिषद
देहाती कुटीर,ग्राम. जगन्नाथपुर
पोस्ट. बनेली, जिला .पूर्णिया
।बिहार।



कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें