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मंगलवार, 19 जून 2018

राजकमल चौधरी न मंटो थे, न गिंसबर्ग और न ही मुक्तिबोध

19 जून 2018
पुष्य मित्र, वरिष्ठ पत्रकार

आज हिंदी और मैथिली के कवि-कथाकार राजकमल चौधरी की पुण्यतिथि है. 51वीं. जिंदा होते तो 90 की उम्र में पहुंचने वाले होते. यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि उनका बुढ़ापा कैसा होता. बहरहाल वैसा नहीं होता, जैसा पिछले एक हफ्ते से दिख रहा है. फेसबुक पर इन दिनों राजकमल चौधरी फिर से जिंदा हो गये हैं. बहसों में, तुलनाओं में, उपेक्षाओं के पक्ष और विपक्ष के साथ और इस स्टेटमेंट के साथ कि हिंदी में राजकमल को वह नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे.

जब यह सब लिखा जा रहा है तो मैं राजकमल चौधरी की लिखी इन पंक्तियों को पढ़ रहा हूं और हंस रहा हूं. उन्होंने लिखा है, अगर मैं सफल हो गया तो वे तमाम लोग असफल हो जायेंगे जिनकी रचनाएं स्कूल की किताबों में छपती हैं. और फिर उन्होंने बेखौफ होकर लिखा था, कृपया पुलिसिया मनोवृत्ति के लोग मेरी रचनाओं को न पढ़ें, उनकी भावनाओं के आहत होने का खतरा है.



इन पंक्तियों को पढ़कर मैं सोचता हूं कि लोग इस बात को लेकर क्यों परेशान हैं कि राजकमल चौधरी को महान लेखक नहीं माना जाता. हिंदी साहित्य की दुनिया भला उस राजकमल चौधरी की महत्ता को कैसे स्वीकार कर सकती है, जिन्होंने खुद अपने शब्दों से इस महान सत्ता को बार-बार खारिज किया है. वे जानते थे कि वे क्या लिख रहे हैं और इसका अंजाम क्या है. वे यह भी जानते थे कि वे जो लिख रहे हैं, किसके लिये लिख रहे हैं. राजकमल चौधरी ने कभी उन लोगों के लिए नहीं लिखा जो हिंदी लेखकों को सर्टिफिकेट जारी किया करते थे.
उन्होंने सिर्फ और सिर्फ उन पाठकों के लिए लिखा, जो सच जानना चाहते थे और समाज के उस बैकयार्ड का नजारा लेना चाहते थे, जहां हमारी आपकी कुंठाएं डंप होती हैं. इसलिए राजकमल चौधरी को साहित्य के ठेकेदारों ने खारिज किया और पाठकों ने अपनाया.    

आज कोई उन्हें मंटो बता रहा है, तो कोई गिंसबर्ग के चेला, कोई मुक्तिप्रसंग की तुलना मुक्तिबोध के अंधेरे में से. कोई इस बहाने से ऊंचा बता रहा है तो कोई उस बहाने से खारिज कर रहा है. चढ़ाने-उतारने के झगड़े में बहस तीखी हो गयी है. पता नहीं इन तमाम बहसों की वजह क्या है और अंजाम क्या. मैं तो बस इतना समझता हूं और कहना चाहता हूं कि राजकमल न मंटो थे, न धूमिल, न गिंसबर्ग, न मुक्तिबोध और न मलय राय चौधुरी. वे अपने तरीके के अलहदा लेखक थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं से हिंदी की दुनिया में अपनी बिल्कुल अलग पहचान बनायी. कई लोगों ने उन्हें धूमकेतु बताया, जो आया और अपनी चमक बिखेरकर गुजर गया.

साहित्य में यौनिकता वाले शब्दों की वजह से हम अक्सर मंटो, धूमिल, इस्मत चुगताई और राजकमल को एक ही कतार में खड़ा कर देते हैं. मगर चारों लेखकों का कथ्य बिल्कुल अलहदा है. इनमे से शायद ही कोई सेक्स के बारे में लिखता है. मंटो बिंदास लेखक थे, वे बेबाकी से हर बात को लिख देते थे, सो यौन अनुभवों को भी नहीं छिपाते थे.

धूमिल ने कविताओं में यौनिकताओं को गालियों की तरह इस्तेमाल किया. और राजकमल ने उन अनुभवों को उजागर किया अब तक वर्जित थे. क्योंकि उनका मानना था कि वर्जना और संवादहीनता की वजह से औरतें अक्सरहां यौन हमलों का शिकार होती हैं. हमारा समाज सेक्स पर बातें नहीं करता और औरतें सेक्स के अपराध चुपचाप झेलती रहती हैं. संभवतः इसी वजह से औऱतों ने राजकमल के साहित्य को अधिक पसंद किया.

वे कहते थे कि मैंने बस मल से भरे घड़े को फोड़ डाला है, जिस मल को आप देखना नहीं चाहते. मैं आपको वह सब दिखाना चाहता हूं, जिसे आप गंदा कह कर भूल जाना चाहते हैं. अगर पांच किलो चावल की वजह से एक औरत को जमींदार की यौन कुंठा का शिकार बनना पड़ता है तो यह कहानी सामने आनी चाहिए. अगर एक विधवा औरत अपने आश्रयदाता को अपना शरीर सौंपने पर मजबूर होती है तो यह सबको पता होना चाहिए कि कहां क्या बारगेनिंग हो रही है. इसलिए राजकमल की रचनाओं में आये यौन प्रसंग ऐसे नहीं हैं कि उन्हें मंटो जैसा बता दिया जाये. या उसकी तुलना अकविता या भूखी पीढ़ी से की जाये.

हालांकि राजकमल का गिंसबर्ग से जुड़ाव रहा था. मगर इसका यह मतलब नहीं था कि वे गिंसबर्ग के चेले हैं. उसी तरह मुक्तिप्रसंग को अंधेरे में जैसी कविता साबित करने की कोशिश अजीब है. मुक्तिप्रसंग न गुस्सा है, न नाराजगी. बस सिर्फ इतनी सी बात कहती है कि अगर दुनिया ऐसी है तो वेश्याओं और अघोड़ियों की दुनिया में क्या बुराई है. तो क्यों आप उन्हें खारिज करते हैं.

वेश्याओं की मंडी और औघड़ों का श्मशान हमारे समाज का वह बैकयार्ड है, जहां हम झांकना नहीं चाहते हैं. हम अपनी कुंठाओं को वहां डंप करके वापस लौट आते हैं. मगर उस दुनिया में जो कुंठाएं डंप होती हैं, उन्हें वापस उठाकर राजकमल ले आते हैं और कथित सभ्य समाज पर दे मारते हैं. मेरे हिसाब से साढ़े सैंतीस साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह देने वाले इस रचनाकार ने महज दस साल के छोटे से रचनाकाल में चार हजार से अधिक मुद्रित पन्ने लिखे हैं. आप उनके लिखे साहित्य का कोई भी पन्ना उठा लीजिये, कहीं भी अगर आपको एक भी शब्द फालतू मिले तो उसे खारिज कर दीजिये.

चाकुओं की धार की तरह तीखे शब्द और समाज के द्वारा खारिज कर दी गयी दुनिया की कहानियां कहने वाले राजकमल की पहचान उनकी रचनाएं हैं. जो हिंदी में भी वैसी ही हैं, मैथिली में भी तकरीबन वैसी हीं. कहा जाता है, मैथिली में वे थोड़े कम कटु थे. थोड़ा हास-परिहास भी कर लेते थे. हिंदी में तो बस... पता नहीं कैसे थे. मगर जैसे भी थे, उन्हें उनके हिसाब से ही याद कीजिये. उन्हें मंटो या मुक्तिबोध मत बनाइये.

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