साहित्य समाज का दर्पण होता है। कहा भी जाता है साहित्य के बिना समाज अधूरा है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में साहित्यकारों की भूमिका ठीक उसी प्रकार रही जिस प्रकार थर्मामीटर में पारा। सारे राष्ट्र के साहित्यकारों ने इस महान संग्राम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया तो भला बिहार के कलमकार कैसे पीछे रहते ?बिहारी कलमकारों ने भी अपनी अपनी रचनाओं से स्वाधीनता संग्राम के आग में घी डालने का उपक्रम किया, जो वंदनीय है।
हिंदी साहित्य के यशस्वी साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी की रचनाएं स्वाधीनता संग्राम के वीर सपूतों के लिए बड़ी प्रेरणादाई साबित हुई । बेनीपुरी जी के उपन्यास पतितों के देश में, कैदी की पत्नी एवं लाल तारा शब्दचित्र काफी उल्लेखनीय हैं, रामवृक्ष बेनीपुरी जी स्वतंत्रता आंदोलन में कई वर्षों तक कारावास में रहे फिर भी इस कलम के सिपाही ने साहित्य सृजन कर समाज को प्रकाशमान किया।
आचार्य शिवपूजन सहाय ने साहित्य साधना व पत्रकारिता के द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की। विभूति नामक उनकी कहानी संग्रह काफी सार्थक सिद्ध हुई। इनके द्वारा लिखा गया आलेख क्रांति का अमर संदेश संपूर्ण रूप से स्वाधीनता आंदोलन पर ही केंद्रित है। इनके द्वारा रचित दो और आलेख स्वतंत्रता होने से पहले तथा देश का ध्यान भी काफी सराहनीय है, जो आज के परिपेक्ष में भी महत्वपूर्ण है।
बिहारी माटी के लाल, देश के प्रथम राष्ट्रपति के गौरव को प्राप्त करने वाले, देश रत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद जी ने भी अपनी लेखनी से स्वतंत्रता संग्राम के सिपाहियों को झकझोरने का काम किया है। उनकी लिखी कृतियों में चंपारण में महात्मा गांधी और खादी का अर्थशास्त्र अति महत्वपूर्ण एवं प्रार्थित है।
हिंदी साहित्य के लेखक राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह ने भी स्वाधीनता संग्राम को केंद्र में रखकर पुस्तक की रचना की है। इनकी लिखी कथा कृति गांधी टोपी जो सन 1938 ईस्वी में प्रकाशित हुई है, स्वाधीनता संग्राम के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी की पुस्तक भारत की वर्तमान दशा एवं स्वदेशी आंदोलन भवानी दयाल सन्यासी की पुस्तक कारावास की पुस्तक एवं प्रवासी की कहानी गोपाल शास्त्री की पुस्तक राष्ट्रभाषा भूषण, राष्ट्र धर्मोपदेसीका एवं हरिजन स्मृति तथा मोहनलाल महतो वियोगी का महाकाव्य आर्यावर्त ने भी स्वतंत्रता संग्राम में अपनी अतिविशिष्ट भूमिका निभाई।
बनेली स्टेट चंपानगर ड्योढ़ी के मंत्री रहे कविवर रघुवीर नारायण ने भी भोजपुरी भाषा में अनेक देश भक्ति रचनाएं की है। जिन की प्रसिद्ध कविता बटोहिया है, जो देश भक्ति, प्राकृतिक सौंदर्य से ओतप्रोत भावपूर्ण कविता है। इस संबंध में वयोवृद्ध आंचलिक उपन्यासकार व कथाकार श्री विश्वनाथ दास देहाती जी की माने तो उस समय उस क्षेत्र के बच्चे बच्चे की जुबान पर यह कविता थी, ग्रहणी भी गृह कार्य करते वक्त इस कविता को गुनगुनाया करती थी। इससे हमें स्पष्ट पता लगता है कि इस कविता की कितनी महत्ता है।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी देशभक्ति पर आधारित कई कविताओं की रचना की है। इसके अतिरिक्त मुकुटधारी सिंह, केशवराम भट्ट, युगल किशोर सिंह, जीवानंद शर्मा, पीर मोहम्मद मुनीस, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, मनोरंजन प्रसाद सिन्हा, रामदयाल पांडे, कवि मुकुट लाल मिश्र, गोपाल सिंह नेपाली, देवव्रत शास्त्री और जगन्नाथ मिश्र ऐसे बिहारी कलमकार थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को जगाने का काम ही नहीं किया वरन हिंदी का विकास भी किया। बिहारी माटी के इस मां शारदे के पुत्रों ने अपनी ओजपूर्ण लेखनी से भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अपनी एक अलग पहचान बनाई एवं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को सफल बनाने में अविस्मरणीय योगदान दिया।
( ये लेखक के अपने विचार हैं )
अतुल मल्लिक अनजान
देहाती कुटीर, ग्राम. जगन्नाथपुर, पोस्ट. बनेली, जिला. पूर्णिया। बिहार।



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