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शनिवार, 23 जून 2018

"पागल" प्रिया सिन्हा की आज की वर्तमान स्थिति पर चोट करती बेहतरीन कविता... आप भी पढ़ें...

"पागल"

दुनिया में हर कोई पागल है ...

कोई किसी के प्यार में पागल है;
कोई किसी के तकरार में पागल है;
कोई पागल है इजहार-ए-मुहब्बत में तो,
कोई किसी के इन्कार में पागल है !

दुनिया में हर कोई पागल है ...

कोई अपने रोजी रोजगार में पागल है;
कोई रोजी-रोटी के जुगाड़ में पागल है;
कोई पागल है संपूर्णता में भी तो,
कोई हालात-ए-वक्त की मार में पागल है !

दुनिया में हर कोई पागल है ...

कोई खुशी से अपने परिवार में पागल है;
कोई दुखी हो उनसे तिरस्कार में पागल है;
कोई पागल है जीने के नए तौर-तरीकों में तो,
कोई पुराने रिवाज-ओ-संस्कार में पागल है !

दुनिया में हर कोई पागल है ...

कोई अपने बच्चे के दुलार में पागल है;
कोई अपने बच्चे के दुत्कार में पागल है;
कोई पागल है बच्चों के संग रहकर तो,
कोई बच्चे के लौट आने के इंतजार में पागल है !

दुनिया में हर कोई पागल है ...

कोई धन-दौलत बेशुमार में पागल है;
कोई स्वयं के अहंकार में पागल है;
कोइ पागल है दुनिया की फिक्र में तो,
कोई खामख्वाह हीं बेकार में पागल है !

दुनिया में हर कोई पागल है ...

कोई रास-रंग श्रृंगार में पागल है;
कोई सादगी भरे विचार में पागल है;
कोई पागल है उन्मुक्त गगन में भी तो,
कोई बंद दयार-ओ-दीवार में पागल है !

दुनिया में हर कोई पागल है ...

कोई सुख में तो कोई दुख भरे संसार में पागल है;
कोई प्रकाश में तो कोई अंधकार में पागल है;
पागल है हर कोई यहाँ इक दूजे को पागल बनाने में तो,
कोई खुद को समझ बहुत बड़ा समझदार पागल है !

(दयार :- जिला, देश ; उन्मुक्त :- आजाद)




प्रिया सिन्हा
युवा कवियत्री, चित्रकार, पूर्णियां

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