आज विश्व महिला दिवस है. बहुत बढ़िया-बढ़िया लेख-कविताएँ सुबह से पढ़ा है. लेकिन मातृत्व क्या है और पुरुष के जीवन पर कितना असर करता है व ये प्यार चाहे तो एक पुरुष के जीवन को बदलकर इतना बदल सकता है कि जीवन में एक पुरुष हर चाह अपनी एक राह बना लें. इसीलिए एक स्त्रीत्व के प्रेम और पुरुष के त्याग, प्यार व बलिदान की कहानी वैलेंटाइन डे के अलावा स्त्रीत्व दिवस पर भी पढना चाहिए.
कुछ तो नहीं फिर भी जब बिहार को अध्यन करता हूँ और बिहार से बाहर सुनता हूँ बिहार के बारे में तो कभी-कभी मन होता है कि जबाब दूँ इन लोगों को इन प्रकाश झा या अनुराग कश्यप वाली फिल्म देखकर या तो हमें सिर्फ चोर, ड्राईवर, क्रिमिनल या आईएएस या बस सरदार खान टाइप वाले लोग ही समझने की गलती मत करो. खैर जबाब भी देता हूँ तो सन्न रह जाते हैं ऐसे लोग.
ये बिहार की ऐसी कहानियों में हमारी प्रकाश झा, अनुराग कश्यप जैसे से लेकर इन चौथे स्तम्भ वाले हिले हुए पिलर वाली पत्रकारिता का भी बहुत बड़ा हाथ है. जिसे मशाले के लिए रूबी राय तो याद रहता है लेकिन अगले साल इंडिया की नीट टॉपर कल्पना को भूल जाते हैं और लाइव सिटिज जैसे कुछ पोर्टल इसमें भी मशाले खोजने के चक्कर में रहते हैं कि कैसे इस टॉपर को भी किसी तरह फर्जी बताकर यूट्यूब का कुछ व्यू बढ़ा ले.
खैर छोडिये इन बातों को आज स्त्रीत्व दिवस है तो बात करते हैं उस स्त्री की जिसके प्यार ने एक पुरुष को इतना जकड़ा और उसकी जकड इतनी मजबूत थी कि उस अदने से पुरुष दशरथ मांझी को माउंटेनमैन दशरथ मांझी बना दिया. खैर पिछले साल एक यूपीएससी टॉपर ने जब अपनी सफलता का श्रेय अपनी गर्लफ्रेंड को दिया तो भी देश सन्न रह गयी थी शायद ये पहली बार होगी और ये पहली बार नहीं है कि एक पुरुष के जीवन को एक औरत ने ईट से महल बना दिया ऐसे सैकड़ों औरत है चाहे पत्नी के रूप में हो, माँ के रूप में हो, बहन के रूप में हो अन्य रूप में जिसने पुरुष के जीवन को बदल दिया. ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं.
दशरथ मांझी को जब मैंने सुना था तो लगा आखिर कौन है ये आदमी काले-कलूटे, धुल-धूसरित, सर पर एक उजले अजीब टाइप टोपी पहने और हाथ में लाठी भी जिसको आज तो मीडया बड़ा कड़क दिखा रही है. तो मैंने अध्ययन किया इसपर फिर सोचा अरे ये अपनी पत्नी याद की याद व प्रेम में बिहार के गया के निकट गहलौर गांव के एक गरीब मजदूर थे. केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर इन्होंने अकेले ही 360 फुट लंबी 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊँचे पहाड़ को काट के एक सड़क बना डाली। 22 वर्षों परिश्रम के बाद, दशरथ के बनायी सड़क ने अतरी और वजीरगंज ब्लाक की दूरी को 55 किमी से 15 किलोमीटर कर दिया. फिर सोचा हम बचपन से तो ताजमहल के भी बारे सुना करते हैं जिसे दुनियां के सात अजूबों में शामिल किया गया है और प्यार की निशानी मानकर लोग वैसे ही प्यार निभाने की कसमे खाया करते हैं. तो सोचा दोनों को थोडा तुलनात्मक अध्ययन करूँ और फिर निष्कर्ष निकालूं आखिर इतिहासकार इतने चाटुकार, दलाल, बेशर्म कैसे हुए भारत में. जिसने अपनी दलाली व बेशर्मी की पराकाष्ठ को पार करते हुए भारत के इतिहास का खिचड़ी बनाकर नाले में डाल दिया. दैनिक भाष्कर के अनुसार मुमताज, मुगल बादशाह शाहजहां की चौथी वीं पत्नी थीं व कुल 14 पत्नी थी. शाहजहां का जन्म 5 जनवरी 1592 को लाहौर पाकिस्तान में हुआ था. कहते हैं उसने अपनी बेगम मुमताज की याद में ही ताज महल का निर्माण कराया. खैर इसपर अभी भी कई अन्य इतिहास भी है खैर उन्हें भूलते हैं अभी. 17 जून 1631 को अपनी 14 वीं संतान गौहारा बेगम को जन्म देने के दौरान लेवर पेन से मुमताज की मौत हो गई थी. अब दोनों का तुलनात्मक अध्ययन यही कहता है कि दोनों ने अपनी पत्नी के प्यार में एक इतिहास रच कर दुनिया से विदा हुए. लेकिन आपको जानना पड़ेगा कि बिहार में इस आधुनिक युग में बाबा दशरथ मांझी जिस मुसहर समुदाय में जन्म लिए थे उसे आज भी छुआछुत व इंसानी दुनियां से अलग ही समझते हैं अपने आप को प्रोग्रेसिव पूर्व डीजीपी अभयानंद टाइप लोग. जिस दशरथ मांझी को खाने को भी नहीं मिले सही ढंग से और जिस जाति में दो-चार शादी भी आम बात है उस समाज में ही एक व्यक्ति अपने पत्नी से इतना प्यार करता था कि जिस पहाड़ से गिरकर उसकी पत्नी की मौत हुई उस दर्जनों फीट पहाड़ को काटकर दुनियां को एक रास्ता बना दिया. लेकिन प्यार का जब भी नाम आता है तो इस मीडिया और हमारी सरकार को भी दशरथ मांझी याद नहीं आते ये बस ताजमहल के गुणगान में डूबे पड़े रहते हैं. एक राजा के लिए हीरे के महल बना देने में भी कौन सी बड़ी बात है और ये ऐसी प्यार है कि चौथी बीबी के चौदहवें बच्चे के पैदा होने के कारन मृत्यु पर इस मकबरे को प्यार की निशानी लेकिन उस पत्नी के मरने के बाद दस बीबी और करना भी सही व दशरथ मांझी जैसे के बलिदान के सामने खड़ा करना भी गुनाह लगता है फिर भी ये मिडिया कभी गह्लोर तक नहीं जाती. खैर बिहार से जुड़े और न जुड़े रहने वाले लोगों से भी आग्रह है कि हम सिर्फ सरदार खान टाइप वाले लोग नहीं है हम बुद्ध, चाणक्य, आर्यभट, वशिष्ठ नारायण सिंह, राजेन्द्र प्रसाद, जेपी, दिनकर जैसे सैकड़ों वाले लोग भी है. हमें सही तरीके से जानिए व भ्रान्ति दूर कीजिये और हाँ अगले वैलेंटाइन डे अपनी पत्नी व प्यार की याद में मनाना हो तो गह्लोर पर्वत घूमिये और उस इन्सान को महसूस कीजिये उसके प्यार, इंसानियत, वीरता, शहनशीलता, दृढ शक्ति, जिसके सामने पहाड़ जैसी शक्ति भी नहीं टीक पाई. दिल को महसूस देगा एक नई उर्जा व प्यार के साथ.
आइये कभी अपने बिहार....
- बस यूँ ही.....
संतोष कुमार राज
छात्र, चंडीगढ़ विश्वविद्यालय
( मास्टर ऑफ कंप्यूटर एप्पलीकेशन )
विश्व महिला दिवस की बधाई
कुछ तो नहीं फिर भी जब बिहार को अध्यन करता हूँ और बिहार से बाहर सुनता हूँ बिहार के बारे में तो कभी-कभी मन होता है कि जबाब दूँ इन लोगों को इन प्रकाश झा या अनुराग कश्यप वाली फिल्म देखकर या तो हमें सिर्फ चोर, ड्राईवर, क्रिमिनल या आईएएस या बस सरदार खान टाइप वाले लोग ही समझने की गलती मत करो. खैर जबाब भी देता हूँ तो सन्न रह जाते हैं ऐसे लोग.
ये बिहार की ऐसी कहानियों में हमारी प्रकाश झा, अनुराग कश्यप जैसे से लेकर इन चौथे स्तम्भ वाले हिले हुए पिलर वाली पत्रकारिता का भी बहुत बड़ा हाथ है. जिसे मशाले के लिए रूबी राय तो याद रहता है लेकिन अगले साल इंडिया की नीट टॉपर कल्पना को भूल जाते हैं और लाइव सिटिज जैसे कुछ पोर्टल इसमें भी मशाले खोजने के चक्कर में रहते हैं कि कैसे इस टॉपर को भी किसी तरह फर्जी बताकर यूट्यूब का कुछ व्यू बढ़ा ले.
खैर छोडिये इन बातों को आज स्त्रीत्व दिवस है तो बात करते हैं उस स्त्री की जिसके प्यार ने एक पुरुष को इतना जकड़ा और उसकी जकड इतनी मजबूत थी कि उस अदने से पुरुष दशरथ मांझी को माउंटेनमैन दशरथ मांझी बना दिया. खैर पिछले साल एक यूपीएससी टॉपर ने जब अपनी सफलता का श्रेय अपनी गर्लफ्रेंड को दिया तो भी देश सन्न रह गयी थी शायद ये पहली बार होगी और ये पहली बार नहीं है कि एक पुरुष के जीवन को एक औरत ने ईट से महल बना दिया ऐसे सैकड़ों औरत है चाहे पत्नी के रूप में हो, माँ के रूप में हो, बहन के रूप में हो अन्य रूप में जिसने पुरुष के जीवन को बदल दिया. ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं.
दशरथ मांझी को जब मैंने सुना था तो लगा आखिर कौन है ये आदमी काले-कलूटे, धुल-धूसरित, सर पर एक उजले अजीब टाइप टोपी पहने और हाथ में लाठी भी जिसको आज तो मीडया बड़ा कड़क दिखा रही है. तो मैंने अध्ययन किया इसपर फिर सोचा अरे ये अपनी पत्नी याद की याद व प्रेम में बिहार के गया के निकट गहलौर गांव के एक गरीब मजदूर थे. केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर इन्होंने अकेले ही 360 फुट लंबी 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊँचे पहाड़ को काट के एक सड़क बना डाली। 22 वर्षों परिश्रम के बाद, दशरथ के बनायी सड़क ने अतरी और वजीरगंज ब्लाक की दूरी को 55 किमी से 15 किलोमीटर कर दिया. फिर सोचा हम बचपन से तो ताजमहल के भी बारे सुना करते हैं जिसे दुनियां के सात अजूबों में शामिल किया गया है और प्यार की निशानी मानकर लोग वैसे ही प्यार निभाने की कसमे खाया करते हैं. तो सोचा दोनों को थोडा तुलनात्मक अध्ययन करूँ और फिर निष्कर्ष निकालूं आखिर इतिहासकार इतने चाटुकार, दलाल, बेशर्म कैसे हुए भारत में. जिसने अपनी दलाली व बेशर्मी की पराकाष्ठ को पार करते हुए भारत के इतिहास का खिचड़ी बनाकर नाले में डाल दिया. दैनिक भाष्कर के अनुसार मुमताज, मुगल बादशाह शाहजहां की चौथी वीं पत्नी थीं व कुल 14 पत्नी थी. शाहजहां का जन्म 5 जनवरी 1592 को लाहौर पाकिस्तान में हुआ था. कहते हैं उसने अपनी बेगम मुमताज की याद में ही ताज महल का निर्माण कराया. खैर इसपर अभी भी कई अन्य इतिहास भी है खैर उन्हें भूलते हैं अभी. 17 जून 1631 को अपनी 14 वीं संतान गौहारा बेगम को जन्म देने के दौरान लेवर पेन से मुमताज की मौत हो गई थी. अब दोनों का तुलनात्मक अध्ययन यही कहता है कि दोनों ने अपनी पत्नी के प्यार में एक इतिहास रच कर दुनिया से विदा हुए. लेकिन आपको जानना पड़ेगा कि बिहार में इस आधुनिक युग में बाबा दशरथ मांझी जिस मुसहर समुदाय में जन्म लिए थे उसे आज भी छुआछुत व इंसानी दुनियां से अलग ही समझते हैं अपने आप को प्रोग्रेसिव पूर्व डीजीपी अभयानंद टाइप लोग. जिस दशरथ मांझी को खाने को भी नहीं मिले सही ढंग से और जिस जाति में दो-चार शादी भी आम बात है उस समाज में ही एक व्यक्ति अपने पत्नी से इतना प्यार करता था कि जिस पहाड़ से गिरकर उसकी पत्नी की मौत हुई उस दर्जनों फीट पहाड़ को काटकर दुनियां को एक रास्ता बना दिया. लेकिन प्यार का जब भी नाम आता है तो इस मीडिया और हमारी सरकार को भी दशरथ मांझी याद नहीं आते ये बस ताजमहल के गुणगान में डूबे पड़े रहते हैं. एक राजा के लिए हीरे के महल बना देने में भी कौन सी बड़ी बात है और ये ऐसी प्यार है कि चौथी बीबी के चौदहवें बच्चे के पैदा होने के कारन मृत्यु पर इस मकबरे को प्यार की निशानी लेकिन उस पत्नी के मरने के बाद दस बीबी और करना भी सही व दशरथ मांझी जैसे के बलिदान के सामने खड़ा करना भी गुनाह लगता है फिर भी ये मिडिया कभी गह्लोर तक नहीं जाती. खैर बिहार से जुड़े और न जुड़े रहने वाले लोगों से भी आग्रह है कि हम सिर्फ सरदार खान टाइप वाले लोग नहीं है हम बुद्ध, चाणक्य, आर्यभट, वशिष्ठ नारायण सिंह, राजेन्द्र प्रसाद, जेपी, दिनकर जैसे सैकड़ों वाले लोग भी है. हमें सही तरीके से जानिए व भ्रान्ति दूर कीजिये और हाँ अगले वैलेंटाइन डे अपनी पत्नी व प्यार की याद में मनाना हो तो गह्लोर पर्वत घूमिये और उस इन्सान को महसूस कीजिये उसके प्यार, इंसानियत, वीरता, शहनशीलता, दृढ शक्ति, जिसके सामने पहाड़ जैसी शक्ति भी नहीं टीक पाई. दिल को महसूस देगा एक नई उर्जा व प्यार के साथ.
आइये कभी अपने बिहार....
- बस यूँ ही.....
संतोष कुमार राज
छात्र, चंडीगढ़ विश्वविद्यालय
( मास्टर ऑफ कंप्यूटर एप्पलीकेशन )
विश्व महिला दिवस की बधाई




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